नागरिक शास्त्र में लोकतांत्रिक नागरिकता, संवैधानिक मूल्य और समकालीन भारत : एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Authors

  • Kamlesh Bansal

Keywords:

नागरिक शास्त्र, लोकतंत्र, संविधान, नागरिकता, मौलिक अधिकार, मौलिक कर्तव्य, राजनीतिक सहभागिता, स्थानीय स्वशासन, नागरिक चेतना।

Abstract

नागरिक शास्त्र सामाजिक विज्ञान की वह महत्वपूर्ण शाखा है जो नागरिक, राज्य, संविधान, शासन-व्यवस्था, अधिकारों, कर्तव्यों तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करती है। आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में नागरिक शास्त्र का महत्व केवल राजनीतिक संस्थाओं की जानकारी प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिकों में संवैधानिक चेतना, लोकतांत्रिक दृष्टिकोण, सामाजिक उत्तरदायित्व, समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व जैसे मूल्यों को विकसित करने का माध्यम भी है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में नागरिक शास्त्र की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र अनेक भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों, क्षेत्रों और सामाजिक समूहों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास करता है। भारतीय संविधान नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करने के साथ-साथ राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों तथा मौलिक कर्तव्यों के माध्यम से एक उत्तरदायी सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था की आधारशिला प्रस्तुत करता है। वर्तमान समय में लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने राजनीतिक ध्रुवीकरण, सामाजिक असमानता, गलत सूचना, डिजिटल माध्यमों का प्रभाव, नागरिक उदासीनता और सार्वजनिक संस्थाओं में विश्वास से संबंधित चुनौतियाँ दिखाई देती हैं। ऐसी परिस्थितियों में नागरिक शास्त्र नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ उनके कर्तव्यों और सामाजिक दायित्वों को समझने में सहायता करता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में नागरिक शास्त्र की अवधारणा, भारतीय लोकतंत्र में इसकी भूमिका, संविधान एवं नागरिकता का संबंध, मौलिक अधिकार एवं कर्तव्य, लोकतांत्रिक संस्थाएँ, चुनावी प्रक्रिया, स्थानीय स्वशासन तथा डिजिटल युग में नागरिक चेतना का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि लोकतंत्र की सफलता केवल संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती पर निर्भर नहीं करती, बल्कि जागरूक, विवेकशील, सहिष्णु और उत्तरदायी नागरिकों की सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है।

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Published

30-06-2022

Issue

Section

शोध-पत्र