सतत वाणिज्य और हरित व्यवसाय: पर्यावरणीय उत्तरदायित्व एवं आर्थिक विकास का समन्वय

Authors

  • Kuldeep

Keywords:

सतत वाणिज्य, हरित व्यवसाय, सतत विकास, हरित विपणन, परिपत्र अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व, जिम्मेदार उपभोग।

Abstract

इक्कीसवीं सदी में आर्थिक विकास, व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना वाणिज्य के सामने प्रमुख चुनौती बन गया है। पारंपरिक व्यावसायिक मॉडल मुख्यतः उत्पादन, बिक्री, लाभ और बाजार विस्तार पर केंद्रित रहे हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण, प्रदूषण, जैव विविधता में कमी और बढ़ते अपशिष्ट ने व्यवसायों को अपने संचालन की पर्यावरणीय लागत पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है। इसी संदर्भ में सतत वाणिज्य और हरित व्यवसाय की अवधारणाएँ विकसित हुई हैं। सतत वाणिज्य का उद्देश्य ऐसी व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देना है जिनमें आर्थिक लाभ के साथ पर्यावरणीय संरक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व को भी महत्व दिया जाए। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में जिम्मेदार उपभोग एवं उत्पादन को वैश्विक सतत विकास का महत्वपूर्ण घटक माना गया है।
हरित व्यवसाय ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा, टिकाऊ कच्चे माल, पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग, अपशिष्ट पुनर्चक्रण, कार्बन उत्सर्जन में कमी और परिपत्र अर्थव्यवस्था जैसे उपायों को अपने व्यावसायिक मॉडल में सम्मिलित कर सकते हैं। इससे न केवल पर्यावरणीय प्रभाव कम करने की संभावना रहती है, बल्कि लागत में कमी, ब्रांड प्रतिष्ठा, ग्राहक विश्वास और दीर्घकालीन प्रतिस्पर्धात्मक लाभ भी प्राप्त हो सकते हैं। दूसरी ओर, हरित परिवर्तन में प्रारंभिक निवेश, तकनीकी क्षमता, आपूर्ति-श्रृंखला की जटिलता और उपभोक्ता जागरूकता जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र सतत वाणिज्य की अवधारणा, हरित व्यवसाय मॉडल, उपभोक्ता व्यवहार, आपूर्ति-श्रृंखला, कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व, परिपत्र अर्थव्यवस्था और भारत जैसे विकासशील देश में इसकी संभावनाओं का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

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Published

31-12-2021

Issue

Section

शोध-पत्र