भारतीय कला में लोक एवं जनजातीय परंपराओं का समकालीन पुनर्पाठ: बदलते सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में कला की भूमिका
Keywords:
लोक कला, जनजातीय कला, भारतीय कला, सांस्कृतिक विरासत, मधुबनी, वारली, गोंड कला, आधुनिक कला, वैश्वीकरण, सांस्कृतिक पहचानAbstract
भारतीय कला परंपरा अपनी विविधता, सांस्कृतिक गहराई और निरंतर परिवर्तनशीलता के लिए जानी जाती है। भारतीय लोक एवं जनजातीय कला इस व्यापक कलात्मक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें समुदायों की सामाजिक स्मृतियाँ, धार्मिक विश्वास, प्रकृति के साथ संबंध, जीवन-पद्धति और सांस्कृतिक पहचान दृश्य रूप में अभिव्यक्त होती हैं। मधुबनी, वारली, गोंड, पटचित्र, भील, पिथोरा तथा अनेक क्षेत्रीय लोक कला रूप लंबे समय तक स्थानीय और सामुदायिक संदर्भों में विकसित हुए। आधुनिकता, शहरीकरण, शिक्षा, बाजार और वैश्वीकरण के विस्तार ने इन कलाओं के पारंपरिक स्वरूप और उपयोग को प्रभावित किया है। किंतु इन परिवर्तनों को केवल संकट के रूप में देखना उचित नहीं है, क्योंकि इन्होंने लोक एवं जनजातीय कलाकारों को नए दर्शक, बाजार और अभिव्यक्ति के अवसर भी प्रदान किए हैं। 2017 में प्रकाशित अध्ययन में भी भारतीय लोक एवं जनजातीय कलाओं को सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और मानवीय मूल्यों से जोड़ते हुए इनके व्यापक महत्व पर बल दिया गया है। यह शोध-पत्र भारतीय लोक एवं जनजातीय कला के पारंपरिक स्वरूप, आधुनिक कला के साथ उसके संबंध, वैश्वीकरण और बाजार के प्रभाव, सांस्कृतिक पहचान, महिलाओं की भूमिका, समकालीन कला में पुनर्पाठ तथा संरक्षण की चुनौतियों का विश्लेषण करता है। अध्ययन का मुख्य तर्क यह है कि लोक एवं जनजातीय कला को केवल अतीत की विरासत या सजावटी कला के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे जीवित सांस्कृतिक ज्ञान और निरंतर विकसित होने वाली रचनात्मक परंपरा के रूप में समझना चाहिए।
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