भारतीय चित्रकला में स्त्री की छवि: परंपरा, आधुनिकता और नारीवादी दृष्टिकोण
Keywords:
भारतीय चित्रकला, स्त्री, महिला कलाकार, नारीवाद, अमृता शेर-गिल, आधुनिक कला, स्त्रीवादी कला, लैंगिक पहचान, भारतीय कलाAbstract
भारतीय चित्रकला के इतिहास में स्त्री की छवि निरंतर बदलती सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों के साथ विकसित हुई है। प्राचीन भित्तिचित्रों, शास्त्रीय मूर्तिकला और लघुचित्र परंपराओं से लेकर औपनिवेशिक काल, राष्ट्रवादी कला, आधुनिकतावाद और समकालीन कला तक स्त्री को विभिन्न रूपों में प्रस्तुत किया गया है। कभी वह देवी, माता, पत्नी और आदर्श नारी के रूप में दिखाई देती है, तो कभी प्रेमिका, श्रमिक, कलाकार, सामाजिक संघर्ष की सहभागी और स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में। भारतीय चित्रकला में स्त्री की पारंपरिक छवि प्रायः पुरुष कलाकारों की दृष्टि, धार्मिक आख्यानों और सामाजिक आदर्शों से प्रभावित रही है। आधुनिक काल में इस स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया और कलाकारों ने स्त्री के अनुभव, उसकी सामाजिक स्थिति तथा उसकी व्यक्तिगत पहचान को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना शुरू किया। विशेष रूप से अमृता शेर-गिल की कला ने भारतीय स्त्री के जीवन, एकांत, श्रम और भावनात्मक संसार को आधुनिक चित्रभाषा में अभिव्यक्त किया। स्वतंत्रता के बाद महिला कलाकारों की संख्या और दृश्यता में वृद्धि हुई तथा स्त्रीवादी कला ने शरीर, पहचान, घरेलू जीवन, लैंगिक असमानता और सामाजिक नियंत्रण जैसे प्रश्नों को कला-विमर्श का हिस्सा बनाया। यह शोध-पत्र भारतीय चित्रकला में स्त्री की बदलती छवि का ऐतिहासिक और आलोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है तथा यह विश्लेषित करता है कि किस प्रकार कला में स्त्री की प्रस्तुति “विषय” से “स्वतंत्र सृजनकर्ता” की ओर विकसित हुई। अध्ययन का निष्कर्ष है कि भारतीय कला में स्त्री की छवि को समझने के लिए केवल चित्रों की दृश्य संरचना का अध्ययन पर्याप्त नहीं है; इसके साथ सामाजिक सत्ता-संबंधों, पितृसत्ता, सांस्कृतिक परंपराओं और महिला कलाकारों की रचनात्मक उपस्थिति को भी समझना आवश्यक है।
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