हिन्दी नाटक में सामाजिक परिवर्तन और रंगमंचीय चेतना

Authors

  • डॉ. मनीष चौधरी

Keywords:

हिन्दी नाटक, रंगमंच, सामाजिक परिवर्तन, नाट्य-साहित्य

Abstract

प्रस्तुत शोधपत्र ‘हिन्दी नाटक में सामाजिक परिवर्तन और रंगमंचीय चेतना’ विषय का आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन करता है। भारतेन्दु से मोहन राकेश और समकालीन नाटककारों तक हिन्दी नाटक ने परिवार, सत्ता, इतिहास, मध्यवर्गीय संकट, लैंगिक सम्बन्ध और राजनीतिक विडम्बनाओं को मंच पर प्रस्तुत किया है। इसमें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वैचारिक आधार, साहित्यिक अभिव्यक्ति, भाषा-शैली, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ, प्रतिनिधि रचनाकार, समकालीन चुनौतियों और भविष्य की शोध-दिशाओं पर विचार किया गया है। अध्ययन का उद्देश्य विषय को केवल साहित्यिक प्रवृत्ति के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में समझना है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य अपने समय के प्रश्नों को अभिव्यक्ति देने के साथ पाठक में आलोचनात्मक चेतना और संवेदनशीलता विकसित करता है।

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Published

12-11-2010

Issue

Section

शोध-पत्र