भारतीय कला में परंपरा और आधुनिकता का अंतर्संबंध: स्वतंत्रता के बाद भारतीय कला के बदलते स्वरूप का अध्ययन

Authors

  • Sher Singh

Keywords:

भारतीय कला, आधुनिक कला, परंपरा, आधुनिकता, स्वतंत्रता के बाद की कला, भारतीय आधुनिकतावाद, प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप, लोक कला, सांस्कृतिक पहचान, समकालीन कला

Abstract

स्वतंत्रता के बाद भारतीय कला ने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक जटिल तथा रचनात्मक संवाद विकसित किया। 1947 के बाद भारतीय कलाकारों के सामने केवल नई कलात्मक भाषा विकसित करने की चुनौती नहीं थी, बल्कि स्वतंत्र राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान को भी अभिव्यक्त करने का प्रश्न था। आधुनिक भारतीय कला का विकास न तो पूरी तरह पश्चिमी आधुनिकतावाद की नकल था और न ही पारंपरिक भारतीय कला की यांत्रिक पुनरावृत्ति। इसके बजाय कलाकारों ने भारतीय मिथकों, लोक परंपराओं, धार्मिक प्रतीकों, शास्त्रीय कलाभाषाओं और औपनिवेशिक अनुभवों को आधुनिक चित्रात्मक तकनीकों, अमूर्तन, अभिव्यंजनावाद, घनवाद तथा अंतरराष्ट्रीय कलात्मक प्रवृत्तियों के साथ जोड़ने का प्रयास किया। स्वतंत्रता के पश्चात् प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप जैसे समूहों ने आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्रोत्साहित किया, जबकि अनेक कलाकारों ने भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं से अपनी रचनात्मक प्रेरणा प्राप्त की। रेबेका एम. ब्राउन के अध्ययन के अनुसार 1947 से 1980 के बीच भारतीय कलाकारों ने आधुनिकता और “भारतीयता” के बीच संबंध स्थापित करने का प्रयास किया तथा पूर्व-औपनिवेशिक अतीत और आधुनिकतावादी प्रयोगों को एक साथ प्रस्तुत किया। इस शोध-पत्र में स्वतंत्रता के बाद भारतीय कला में परंपरा और आधुनिकता के अंतर्संबंध का ऐतिहासिक एवं आलोचनात्मक अध्ययन किया गया है। इसमें राष्ट्रवाद, बंगाल स्कूल, प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप, लोक और जनजातीय कला, आधुनिक चित्रकला, अमूर्तन, शहरीकरण, वैश्वीकरण और समकालीन कला के विकास का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि भारतीय आधुनिक कला की विशिष्टता इसी तथ्य में निहित है कि उसने परंपरा और आधुनिकता को परस्पर विरोधी शक्तियों के रूप में न देखकर उनके बीच रचनात्मक संवाद स्थापित किया।

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Published

30-06-2017

Issue

Section

शोध-पत्र