भारतीय लोकतंत्र में संसद और विधायिका की भूमिका : शक्तियाँ, कार्य एवं समकालीन चुनौतियाँ

Authors

  • Samar Kalka

Keywords:

संसद, विधायिका, लोकसभा, राज्यसभा, लोकतंत्र, कानून निर्माण, संसदीय समितियाँ, कार्यपालिका, जनप्रतिनिधित्व, संविधान।

Abstract

भारतीय लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में संसद और राज्य विधानमंडलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विधायिका लोकतंत्र की वह संस्था है जो जनता की राजनीतिक इच्छा को कानूनों, नीतियों और सार्वजनिक विमर्श के माध्यम से शासन-व्यवस्था में अभिव्यक्त करती है। भारत में संसदीय शासन प्रणाली अपनाई गई है, जिसमें संसद संघीय स्तर पर तथा विधानमंडल राज्य स्तर पर कानून निर्माण, वित्तीय नियंत्रण, कार्यपालिका की जवाबदेही और जनप्रतिनिधित्व का कार्य करते हैं। संसद के दो सदन—लोकसभा और राज्यसभा—भारत की संघीय तथा लोकतांत्रिक संरचना को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लोकसभा जनता के प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व का प्रमुख मंच है, जबकि राज्यसभा राज्यों के हितों को राष्ट्रीय विधायी प्रक्रिया से जोड़ती है। विधायिका का कार्य केवल कानून बनाना नहीं है; प्रश्नकाल, चर्चा, समितियों, बजट प्रक्रिया और अविश्वास प्रस्ताव जैसे संसदीय साधनों के माध्यम से वह कार्यपालिका पर नियंत्रण भी स्थापित करती है। आधुनिक समय में भारतीय संसद के सामने अनेक चुनौतियाँ उभर रही हैं, जिनमें राजनीतिक ध्रुवीकरण, सदन में व्यवधान, विधायी बहस के लिए सीमित समय, दलीय अनुशासन, जनप्रतिनिधित्व की गुणवत्ता तथा नागरिकों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन प्रमुख हैं। इसके बावजूद संसद लोकतांत्रिक संवाद, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक शासन की केंद्रीय संस्था बनी हुई है। प्रस्तुत शोध-पत्र में भारतीय संसद की संवैधानिक स्थिति, संरचना, विधायी शक्तियाँ, वित्तीय अधिकार, कार्यपालिका पर नियंत्रण, संसदीय समितियों, प्रतिनिधित्व, राज्य विधानमंडलों तथा समकालीन चुनौतियों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि लोकतंत्र की प्रभावशीलता के लिए संसद को अधिक पारदर्शी, विचार-विमर्श आधारित, उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बनाना आवश्यक है।

Downloads

Published

31-12-2022

Issue

Section

शोध-पत्र